आंदोलनो और धरने से अवतरित हुई ईमानदार पार्टी के उदय के साथ हम सब आशातित थे कि दिल्ली और तत्पश्चात लोकसभा के चुनाव के लिए नए सूचक उदय होंगे। जब आप एक संघठन विशेष चाहे राजनीतिक हो या व्यावसायिक सर्वमान्य श्रेष्ठ संस्थानों से उच्च शिक्षित व्यक्ति का आगमन पाते हैं तो नये मापदण्ड और स्तर निरधारित कराना चाहते हैं लेकिन समय जैसे जैसे बढ़ता जा रहा है नई परिपाटी कि अपेक्षा 1989 का चुनाव ही स्मरण होता है जब एक नेता जेब से कागज़ का एक टुकड़ा निकाला करता था और हथियारो और तोपों के दलाल के नाम उस पर लिखा बताया करता था हालाँकि चुनाव विजित होते ही न जाने वो पर्चा किस अचकन के साथ धूल गया। भाषण कला राजनीति का विशेष अंग रहा है और इस में विशेष पारंगता अटल जी और लालू जी ने अपनी अपनी शैली में प्रदर्शित की है यद्धपि अटल जी ही संपूर्ण राजनेतिक जीवन में अपनी प्रांसगिकता बना रख पाए लालू जी वृहत समाज के लिए सुनने और हास्य का विषय बन के रह गए। और नए उदय में लालू जी का ही पढ़ा लिखा संस्करण अभिभूत हो रहा है। स्व-घोषित ईमानदार होना और उस पर स्थापित रहना अच्छी बात है लेकिन किसी भी आरोप प्रत्यारोप को तार्किक परिणीति पर पहुँचाये बिना अगला आरोप लगाना क्षुद्र राजनीतिक गोरिल्ला युद्ध ही हो सकता है अब जब राजनीति में अधिसंख्य नेता अपनी विश्वनीयता और भाषा सयंम खोते जा रहे हैं तो इनका आगमन ऐसे नेताओं कि संख्या बढ़ाने का ही प्रयोजन सिद्ध करता दिख रहा है
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